क्रिकेट की दुनिया में टेस्ट, वनडे और टी20 तीनों फॉर्मेट्स का अपना अलग महत्व है। टेस्ट मैच जहां धैर्य और तकनीक की परीक्षा लेते हैं, वहीं टी20 क्रिकेट तेजी और मनोरंजन का प्रतीक बन चुका है। लेकिन ODI Cricket ने हमेशा से एक आदर्श संतुलन बनाए रखा है यह न तो बहुत लंबा है और न ही बहुत छोटा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि वनडे में 50 ओवर ही क्यों होते हैं?
ODI Cricket की शुरुआत और प्रारंभिक बदलाव

ODI Cricket की शुरुआत एक संयोग से हुई थी। 5 जनवरी 1971 को मेलबर्न में ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच एक टेस्ट मैच बारिश के कारण रद्द हो गया। इसे एक नए प्रारूप में बदला गया 40 ओवर का मैच (प्रत्येक ओवर 8 गेंदों का)। इस प्रयोग को दर्शकों ने काफी पसंद किया, और यहीं से ODI Cricket का सफर शुरू हुआ।
शुरुआत में, वनडे मैचों की ओवर सीमा अलग-अलग थी। इंग्लैंड में 60 ओवर का प्रारूप अपनाया गया क्योंकि वहां घरेलू क्रिकेट में यही प्रचलित था। 1975 में हुए पहले क्रिकेट वर्ल्ड कप में भी 60 ओवर प्रति पारी का नियम रखा गया। लेकिन जैसे-जैसे क्रिकेट लोकप्रिय हुआ, खासकर टेलीविजन प्रसारण के कारण, यह महसूस किया गया कि 60 ओवर बहुत लंबा हो रहा है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों में 50 से 55 ओवर के प्रारूप को अपनाया गया।
50 ओवर का फॉर्मेट क्यों हुआ और उसके फायदे

1979 में केरी पैकर की वर्ल्ड सीरीज क्रिकेट ने 50 ओवर के फॉर्मेट को लोकप्रिय बनाया। इस फॉर्मेट की सबसे बड़ी चुनौती थी दिन के उजाले में ही मैच समाप्त करना, ताकि खिलाड़ियों और दर्शकों को परेशानी न हो। 1987 का वर्ल्ड कप भारत और पाकिस्तान में हुआ, जहां 60 ओवर का मैच संभव नहीं था क्योंकि दिन जल्दी ढल जाता था। इसी कारण से 50 ओवर को आधिकारिक रूप से अपनाया गया और आईसीसी ने इसे मानक बना दिया।
इसके फायदे:
7-8 घंटे में पूरा होने वाला यह फॉर्मेट दर्शकों और प्रसारकों के लिए सुविधाजनक है।बल्लेबाजों के पास बड़ी पारियां खेलने का मौका होता है, लेकिन गेंदबाजों को भी रणनीति के साथ वापसी करने का समय मिलता है।
यह न तो बहुत लंबा है कि दर्शक बोर हो जाएं और न ही बहुत छोटा कि खेल पूरी तरह से बल्लेबाजों के पक्ष में चला जाए।
इस तरह, 50 ओवर का वनडे फॉर्मेट पिछले 27 सालों से क्रिकेट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है और भारत का 1983, 2011 जैसे ऐतिहासिक वर्ल्ड कप जीतने की यादें इससे जुड़ी हुई हैं।